डिजिटल युग में लोग खुद सोचना छोड़ रहे हैं और रील्स, टीवी डिबेट या एआई पर निर्भर हो रहे हैं। यह प्रवृत्ति मानसिक विकास में बाधक बन रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया पर अफवाहें फैलाना और बिना सोचे-समझे उन्हें मान लेना आम हो गया है। यह भेड़चाल का रूप ले चुका है, जिसका फायदा निहित स्वार्थी तत्व उठाते हैं। एल्गोरिदम के जरिए ब्रेनवाश करने की कोशिशें भी हो रही हैं, जिससे लोगों की स्वतंत्र सोच खतरे में है।
सोचने की आदत खो रहे हैं लोग, चिंता बढ़ी
Source: Lokmat Hindi
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